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सैलरी के साथ-साथ सैलरी स्लिप भी लेना जरूरी, ये हैं बड़े कारण

हर महीने सैलरी के साथ साथ नियोक्ता से सैलरी स्लिप लेना न भूलें। जानिए क्यों जरूरी है यह डॉक्यूमेंट।

Surbhi Jain [Updated:27 Oct 2015, 3:52 PM IST]
सैलरी के साथ-साथ सैलरी स्लिप भी लेना जरूरी, ये हैं बड़े कारण- IndiaTV Paisa
सैलरी के साथ-साथ सैलरी स्लिप भी लेना जरूरी, ये हैं बड़े कारण

अगर आप नौकरी करते हैं तो हर महीने केवल अपने खाते में सैलरी के पैसे आने के बाद निश्चिंत मत हो जाइए। सैलरी के साथ साथ हर महीने बनने वाली सैलरी स्लिप को भी अपने नियोक्ता से लेना न भूलें। इस स्लिप में आपकी सैलरी से जुड़ी तमाम बातें लिखी होती हैं जो भविष्य में आपके काम आती हैं।

समझिए सैलरी स्लिप क्यों है जरूरी


नौकरी बदलने के दौरान जरूरी होती है सैलरी स्लिप।
कर संबंधी परेशानियों के समाधान में भी सैलरी स्लिप मददगार साबित होती है। सैलरी स्लिप से यह आसानी से पता लगाया जा सकता है सैलरी का कितना हिस्सा करयोग्य है और कितना करमुक्त।

ये हैं सैलरी स्लिप के प्रमुख हिस्से

1. बेसिक सैलरी
यह सैलरी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा जो कुल सैलरी के 35 से 50 फीसदी तक होता है। कर्मचारी को मिलने वाले तमाम लाभ सैलरी के इसी हिस्से पर मिलते हैं। टैक्स की दृष्टि से देखें तो यह पूरा हिस्सा कर योग्य होता है।

2. हाउस रेंट अलाउंस (House Rent Allowance)
घर का रेंट चुकाने के लिए मिलने वाला भत्ता। HRA बेसिक सैलरी का 40 से 50 फीसदी तक होता है, जो कि आपके स्थानीय निवास पर निर्भर करता है।

3. यात्रा भत्ता (Conveyance Allowance)

घर से ऑफिस और ऑफिस से घर तक आने जाने के लिए कंपनी की तरफ से दिया जाने वाला भत्ता। इसमें अधिकतम 1600 रुपए या इससे कम की राशि जो कि आपकी सैलरी स्लिप के मुताबिक देय है करमुक्त होती है।

4. लीव ट्रैवल अलाउंस (LTA)

छुट्टियों के दौरान नियोक्ता अपने कर्माचारियों को यह भत्ता भी देता है, जिसमें आपके परिवार का ट्रैवल खर्च भी शामिल होता है। टैक्स में राहत लेने के लिए सफर के खर्चे की सभी रशीदें जरूरी। साथ ही सफर के खर्च के अलावा किसी भी प्रकार का खर्च आपके LTA में शामिल नहीं होगा। 4 वित्त वर्षों के दौरान सिर्फ 2 यात्राएं कर छूट के दायरे में आती हैं।

5. मेडिकल अलाउंस

नियोक्ता (Employer) अपने कर्मचारी को सेवा के दौरान किए गए मेडिकल खर्चे का भुगतान भी भत्ते के रूप में करता है। यह भुगतान आपको बिल के बदले मिलता है, इसके लिए आपको मेडिकल खर्च की रसीद देनी होती है। टैक्स की दृष्टि से 15000 रुपए के सालाना मेडिकल बिल करमुक्त हैं।

6. पर्फोरमेंस बोनस और स्पेशल अलाउंस

यह नियोक्ता की ओर से कर्मचारी के प्रोत्साहन के लिए दिया जाने वाला भत्ता होता है। इसकी 100 फीसदी रकम कर योग्य होती है। इसके अतिरिक्त भी सैलरी में कुछ अन्य अलाउंस शामिल होते हैं, जो पूरी तरह करयोग्य होते हैं।

सैलरी में से डिडक्ट होने वाले हिस्से

1. प्रोविडेंट फंड (PF)- हर महीने आपकी सैलरी से प्रोविडेंट फंड के लिए बेसिक सैलरी का 12 फीसदी हिस्सा कटता है। साथ ही इतनी ही राशि नियोक्ता आपके पीएफ खाते में जमा करता है। कटौती की दर कंपनी नियमों के हिसाब से तय होती है।

2. प्रोफेशनल टैक्स- केवल कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात, असम, छत्तीसगढ़, केरल, मेघालय, ओडिशा, त्रिपुरा, झारखंड, बिहार और मध्य प्रदेश में मान्य। इसमें आपके टैक्स स्लैब के मुताबिक आपकी सैलरी का कुछ अंश काटा जाता है।

3. स्त्रोत पर कर कटौती- आयकर विभाग के नियमों के तहत नियोक्ता आपके कुल टैक्स स्लैब से कटौती की राशि तय करता है और इसको टीडीएस के रूप में आपकी सैलरी से काटता है। टीडीएस कटने से बचाने के लिए वित्त वर्ष के शुरूआत में ही सालाना बचत का एक अनुमान नियोक्ता को सौपें और टैक्स बचाने के लिए 80 C धारा के तहत निवेश करें।

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