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क्या है एक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का भारतीय बजट से कनेक्शन ?

आज यानी 1 फरवरी को केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2017-18 का आम बजट पेश किया। दिलचस्प बात ये है कि ठीक एक दिन बात यानी 2 फरवरी,1946 को ‘पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली

India TV News Desk [Updated:01 Feb 2017, 5:12 PM IST]
क्या है एक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का भारतीय बजट से कनेक्शन ?

आज यानी 1 फरवरी को केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2017-18 का आम बजट पेश किया। दिलचस्प बात ये है कि ठीक एक दिन बात यानी 2 फरवरी,1946 को ‘पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली ख़ान ने भारत का बजट इसी संसद भवन ( तब लेजिस्लेटिव असेंबली भवन) में पेश किया था। दरअसल लियाकत अली खान तब पंडित जवाहर लाल नेहरु के प्रधानमंत्रित्व में गठित अंतरिम सरकार में वित्त मंत्री थे। 

लियाकत अली ख़ान मोहम्मद अली जिन्ना के क़रीबी माने जाते थे। लियाकत अली खान देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान के पहले प्रधानमत्री बने। वे देश के बंटवारे से पहले मेरठ और मुजफ्फरनगर से यूपी एसेंबली के लिए चुनाव भी लड़ते थे। वे आल इंडिया मुस्लिम लीग के भी शिखर नेता थे। जब अंतरिम सरकार का गठन हुआ तो मुस्लिम लीग ने उन्हें अपने नुमाइंदे के रूप में भेजा। उन्हें पंडित नेहरु ने वित्त मंत्रालय सौंपा।

लियाकत खान ने अपने बजट प्रस्तावों को ‘सोशलिस्ट बजट’ बताया था पर उनके बजट से देश की इंडस्ट्री ने काफी नाराजगी दिखाई। लियाकत अली खान पर आरोप लगा कि उन्होंने कर प्रस्ताव बहुत ही कठोर रखे जिससे उनके हितों को चोट पहुंची। 

लियाकत अली पर ये भी आरोप लगे कि वे अंतरिम सरकार में हिन्दू मंत्रियों के खर्चो और प्रस्तावों को हरी झंडी दिखाने में खासा वक्त लेते हैं। सरदार पटेल ने तो यहां तक कहा था कि वे लियाकत अली खान की अनुमति के बगैर एक चपरासी की भी नियुक्त नहीं कर सकते। लियाकत अली खान के बचाव में भी बहुत से लोग आगे आए थे। उनका तर्क था कि वे हिन्दू विरोधी नहीं हो सकते क्योंकि उनकी पत्नी गुल-ए-राना मूलत: हिन्दू परिवार से ही थीं। ये बात दीगर है कि उनका परिवार एक अरसा पहले ईसाई हो गया था। 

देश के विभाजन और मोहम्मद अली जिन्ना की मृत्यु के बाद लियाकत अली खान पाकिस्तान के निर्विवाद रूप से सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए। उनकी 1951 में रावलपिंडी में एक सभा को संबोधित करने के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। महत्वपूर्ण है कि जिस मैदान में खान की हत्या हुई थी उसी मैदान में दशकों बाद बेनजीर भुट्टो की भी हत्या हुई।

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